पीएम मोदी छोटे मुल्कों की क्यों कर रहे हैं यात्रा? पहली बार भूटान अब मालदीव


दूसरी बार प्रधानमंत्री पद संभालने के बाद नरेंद्र मोदी ने पहले विदेशी दौरा के लिए जब मालदीव को चुना तो खासी चर्चा हुई। यहीं नहीं चर्चा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि इससे पहले जब  2014 में पहली बार मोदी प्रधानमंत्री बने तो भूटान की यात्रा पर गए थे।

मालदीव में 2013 से 2018 तक रही अब्दुल्ला यामीन सरकार ने भारत को नज़रंदाज़ कर चीन से खुले आम दोस्ती का हाथ बढ़ाया था और अरबों डॉलर के व्यावसायिक समझौते भी किए थे। यही कारण है कि पीएम मोदी ने अपने सम्बोधन की शुरुआत में ही कहा कि राष्ट्रपति सोलिह आपके पद ग्रहण करने के बाद से द्विपक्षीय सहयोग की गति और दिशा में मौलिक बदलाव आया है। बता दें कि अब्दुल्ला यामीन सरकार के समय दर्जनों चीनी कम्पनियों ने मालदीव में निवेश शुरू कर दिया। जिसमें होटल, रिसॉर्ट्स, बंदरगाह और राजधानी माले को हवाई अड्डे वाले द्वीप से जोड़ने वाले एक बेहद जरूरी फ्लाईओवर का निर्माण भी शामिल था।

जानकारों का मानना है कि चीन मालदीव को अपने कर्ज से लादकर अघोषित तौर पर अपने अधीन करना चाहता है। यही कारण है कि अपने पहले विदेशी दौरे के लिए मालदीव को चुनकर भारत अंतरराष्ट्रीय समुदाय को ये संदेश देना चाहता है कि उसके अपने क़रीबी पड़ोसी देश उसके साथ हैं।

पीएम मोदी के पहली बार प्रधानमंत्री बनने के बाद उनका पहला विदेशी दौरा भूटान का था। 1949 में फ्रेंडशिप ट्रिटी के बाद से ही भारत के भूटान के साथ अच्छे संबंध हैं। डोकलाम को लेकर भूटान और चीन की लड़ाई में भारत भूटान की मदद कर चुका है। भूटान दौरे से पहले ही पीएम मोदी ने कहा था कि मैं पहले से ही मजबूत संबंधों को और मजबूत करने के लिए अत्यंत खुशी और दृढ़ इच्छा के साथ भूटान जा रहा हूं।

अपने दोनों पहले विदेशी दौरों में भूटान और मालदीव जैसे देशों को चुनना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक अलग प्रकार की विदेश नीति को दर्शाता है। जानकारों की मानें तो प्रधानमंत्री मोदी भूटान और मालदीव जैसे छोटे देशों से संबंध प्रगाढ़ कर भारत को इन देशों के मुखिया देश के रूप में स्थान दिलाना चाहते हैं। इस काम में अमेरिका भी बढ़चढ़ कर भारत का समर्थन कर रहा है। जिससे विश्व में चीन के बढ़ते प्रभाव को कम किया जा सके।
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